Tuesday, May 19, 2020

सन्त रामपाल जो महाराज कर रहे है विश्व में सबसे बड़ा समाज सुधारक कार्य

सन्त रामपाल जो महाराज कर रहे है विश्व सबसे बड़ा समाज सुधारक कार्य

■ नमस्कार दोस्तों आज आप सबको हम यह बताएंगे कि संत रामपाल जी महाराज जी एक ऐसे संत है जो सत भक्ति देने के साथ-साथ पूरे विश्व में समाज कल्याण तथा सामाजिक कार्य तथा सबसे बड़े समाज सुधारक के रूप में कर रहे हैं


संत रामपाल जी महाराज ने लाखों लोगों को नशे से मुक्त कर दिया लाखों लोग जो कि सभी प्रकार की बुराइयां करते थे उन सब की बुराइयां छुड़वा दी समाज के अंदर जितनी भी कुप्रथा थी वह संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने करोड़ों  शिष्यों से छुड़वा दी
 दोस्तों संत रामपाल जी महाराज जी के जितने भी अनुयाई हैं वह सभी किसी भी प्रकार की कोई बुराई नहीं करते कभी झूठ नहीं बोलते हैं किसी भी प्रकार का कोई नशा नहीं करते पहले जो समाज में व्याप्त कुरीतियां थे वह भी संत रामपाल जी की स्टिक के शिष्यों ने त्याग दी है संत रामपाल जी महाराज जी के शिष्य शादी के अंदर ना तो दहेज लेते हैं और ना ही दहेज देते हैं दोस्तों संत रामपाल जी महाराज जी का मिशन यह है कि वह पूरे विश्व को एक करना चाहते हैं पूरे विश्व में शांति स्थापित करना चाहते हैं पूरे विश्व को सत भक्ति कराना चाहते हैं

■ संत रामपाल जी महाराज जी द्वारा किए गए सामाजिक सुधारक कार्य





संत रामपाल जी महाराज जी ने भारत ही नहीं पूरे विश्व में से पाखंडवाद को हटाने के लिए मिशन चलाया है संत रामपाल जी महाराज जी ने सब संतों का पर्दाफाश कर दिया जितने भी संत है उन सबको संत रामपाल जी महाराज जी ने तत्वज्ञान से निचोड़ कर यह बता दिया जनता के समक्ष कि इनके पास कुछ भी नहीं है यह पाखंडी है जनता को गुमराह करते हैं इनके पास कोई भी सत भक्ति नहीं है संत रामपाल जी महाराज जी ने सभी धर्मों के पवित्र शास्त्रों के आधार पर सत भक्ति बताते हैं जिससे सत भक्ति करने वाले साधकों को पूर्ण लाभ मिलता है तथा मोक्ष भी मिलता है संत रामपाल जी महाराज जी ने समाज में व्याप्त रूढ़ीवादी पारंपारिक कुर्तियों का नाश कर दिया संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने अनुयायियों से सभी बुराइयों नहीं करनी के लिए कहा है संत रामपाल जी महाराज जी के शिष्य कोई भी फिजूलखर्ची नहीं करते चोरी जारी डकैती तथा किसी गरीब को सताना तथा कोई भी अनुचित कार्य नहीं करते सभी भगवान से डरने वाले हैं सत भक्ति करते हैं संत रामपाल जी महाराज जी ने इंसान को पशु श्रेणी से देवता श्रेणी में बना दिया है इससे बड़ा समाज सुधारक मेरे ख्याल से तो इस पूरे ब्रह्मांड में भी नहीं है

∆ संत रामपाल जी महाराज जे समाज सुधार की एक झलक आप भी जरूर देखें👇👇

★दहेज का खात्मा


★बुजुर्गों की सेवा और चोरी और नशा


★ ऐसे होगा समाज का सुधार


★ मौत के बाद का सच


दोस्तो आप सभी को पता है कि पूरे विश्व मे एकमात्र सच्चे ओर निःस्वार्थी सच्चे समाज सुधारक संत है  सिर्फ संत रामपाल जी महाराज जी दोस्तो में आप सभी विशेष विनम्रता पूर्वक पार्थना करता हु की आप सभी संत रामपाल जी महाराज जी के अनमोल ज्ञान को जरूर सुने ओर उनके द्वारा लिखी गई बहुत दुर्लभ ओर अनमोल पुस्तको को जरूर पढ़े जी तथा विचार विमर्श करके उनसे नाम दीक्षा लो अपना कल्याण करवाओ जी

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संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तकें ओर उनके अनमोल सत्संग वचनों को सुनने के लिए वेबसाइट पर जरूर जाईये जी


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Writer 

Surendra Mehra

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Thursday, May 14, 2020

'भारत का पुनरुथान"

  • भारत का एक बार फिर से पुनरुत्थान



भारत का स्थान आध्यात्मिक शक्ति सही होगा जैसा कि आप सब जानते हैं वर्तमान समय में भारत का पूरी तरह से पतन हो चुका है भारत एक विकासशील देश है इस की टोटल आबादी 131 करोड़ के लगभग है वर्तमान समय में भारत के अंदर एक कोरा में जैसी महामारी ने दस्तक दे दी जिसके परिणाम स्वरूप भारत की आर्थिक व्यवस्था बहुत ही डगमगा गई है और डगमगाएगी एक बार तो चारों तरफ हाहाकार मची की लेकिन उस को कंट्रोल करने वाला एक अध्यात्मिक धर्मगुरु होगा जो कि पूरे विश्व को एक कर देगा भारत सभी देशों का अगुआ होगा भारत एक बार पुनः सोने की चिड़िया वाला देश बन जाएगा

दोस्तों आपने सुना है कि भारत विश्व गुरु बनेगा लेकिन विश्व गुरु बनेगा कैसे यह किसी को पता नहीं तो चलिए आपको बताते हैं भारत विश्व गुरु कैसे बनेगा और भारत का उत्थान कैसे होगा

दोस्तो भारत विश्व गुरु बनेगा आध्यात्मिक तत्वदर्शी संत की अगुवाई में पर वह संत वर्तमान के अंदर भारत की पावन भूमि पर विराजमान है उनका ज्ञान दिन दुगनी रात चौगुनी से बढ़ रहा है उस संत के अनुयाई सभी प्रकार  की बुराइयां और बुरे व्यसन और मांसाहार भी त्यागकर सत भक्ति कर रहे हैं दोस्तों एक समय ऐसा आएगा कि पूरा विश्व उसका शिष्य बन जाएगा और उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर चलेगा पूरा विश्व सभी प्रकार की बुराइयां त्याग देगा सभी शांति से रहेंगे कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होगा सभी देश एक हो जाएंगे सभी देशों का एक ही झंडा होगा एक ही भाषा होगी सभी देश संत के बताए अनुसार मार्ग पर चलेंगे फिर पूरा विश्व ही एक देश हो जाएगा इन सब का कंट्रोल भारत में ही होगा वह संत सत्ताधारी और बेईमानी लोगों पर अंकुश कस देगा

चलिए दोस्तों आपको फ्रांस के  भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस की भारत में जन्म ले चुके एक संत के बारे में भविष्यवाणी दिखाते है




‘विश्व विजेयता सन्त’’

(संत रामपाल जी महाराज की अध्यक्षता में हिन्दुस्तान विश्व धर्मगुरु

के रूप में प्रतिष्ठित होगा)

”संत रामपाल जी के विषय में ’’नास्त्रोदमस‘‘ की भविष्यवाणी“

फ्रैंच (फ्रांस) देश के नास्त्रोदमस नामक प्रसिद्ध भविष्यवक्ता ने सन् (इ.स.)
1555 में एक हजार श्लोकों में भविष्य की सांकेतिक सत्य भविष्यवाणियां लिखी हैं।
सौ-सौ श्लोकों के दस शतक बनाए हैं। जिनमें से अब तक सर्व सिद्ध हो चुकी हैं।
हिन्दुस्तान में सत्य हो चुकी भविष्यवाणियों में से :-
1ण् भारत की प्रथम महिला प्रधानमन्त्रा बहुत प्रभावशाली व कुशल होगी (यह संकेत स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी की ओर है) तथा उनकी मृत्यु निकटतम रक्षक
द्वारा होना लिखा था, जो सत्य हुई।
2उसके पश्चात् उन्हीं का पुत्रा उनका उत्तराधिकारी होगा और वह बहुत कम
समय तक राज्य करेगा तथा आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त होगा, जो सत्य सिद्ध हुई।
(पूर्व प्रधानमन्त्रा स्व. श्री राजीव गांधी जी के विषय में)।
3 सन्त रामपाल जी महाराज के विषय में भविष्यवाणी नास्त्रोदमस द्वारा जो
विस्तार पूर्वक लिखी हैं।
(क) अपनी भविष्यवाणी के शतक पांच के अंत में तथा शतक छः के प्रारम्भ में
नास्त्रोदमस जी ने लिखा है कि आज अर्थात् इ.स. (सन्) 1555 से ठीक 450 वर्ष
पश्चात् अर्थात् सन् 2006 में एक हिन्दू संत (शायरन) प्रकट होगा अर्थात् सर्व जगत
में उसकी चर्चा होगी। उस समय उस हिन्दू धार्मिक संत (शायरन) की आयु 50
व 60 वर्ष के बीच होगी। परमेश्वर ने नास्त्रोदमस को संत रामपाल जी महाराज के
अधेड़ उम्र वाले शरीर का साक्षात्कार करवा कर चलचित्रा की भांति सारी घटनाओं
को दिखाया और समझाया। श्री नास्त्रोदमस जी ने 16 वीं सदी को प्रथम शतक
कहा है इस प्रकार पांचवां शतक 20 वीं सदी हुआ। नास्त्रोदमस जी ने कहा है कि
वह धार्मिक हिन्दू नेता अर्थात् संत (ब्भ्ल्त्म्छ.शायरन) पांचवें शतक के अंत के
वर्ष में अर्थात् सन् (ई.सं.) 1999 में घर-घर सत्संग करना त्याग कर अर्थात् चौखटों
को लांघ कर बाहर आयेगा तथा अपने अनुयाइयों को शास्त्राविधि अनुसार भक्तिमार्ग
बताएगा। उस महान संत के बताए मार्ग से अनुयाइयों को अद्वितीय आध्यात्मिक
और भौतिक लाभ होगा। उस तत्वदृष्टा हिन्दू संत के द्वारा बताए शास्त्राप्रमाणित
तत्वज्ञान को समझ कर परमात्मा चाहने वाले श्रद्धालु ऐसे अचंभित होगें जैसे कोई
गहरी नींद से जागा हो। उस तत्वदृष्टा हिन्दू संत द्वारा सन् 1999 में चलाई
आध्यात्मिक क्रांति इ.स. 2006 तक चलेगी। तब तक बहु संख्या में परमात्मा चाहने
वाले भक्त तत्व ज्ञान समझ कर अनुयायी बन कर सुखी हो चुके होंगे। उसके
पश्चात् उस स्थान की चौखट से भी बाहर लांघेगा। उसके पश्चात् 2006 से स्वर्ण युग का प्रारंभ होगा।


नोटः प्रिय पाठकजन कृप्या पढ़ें निम्न भविष्यवाणी जो फ्रांस देश के वासी श्री नास्त्रोदमस ने की थी। जिस के विषय में मद्रास के एक ज्योतिशास्त्र के. एस￾कृष्णमूर्ति ने कहा है कि श्री नास्त्रोदमस जी द्वारा सन् 1555 में लिखी भविष्यवाणियो का यथार्थ अनुवाद “सन् 1998 में महाराष्ट्र में एक ज्योतिष शास्त्रा करेगा। वह

ज्योतिष शास्त्रा नास्त्रोदमस की भविष्यवाणियों का सांकेतिक भाषा का स्पष्टीकरण

कर उसमें लिखित भविष्य घटनाओं का अर्थ देकर अपना भविष्य गं्रथ प्रकाशित

करेगा।” उसी ज्योतिषशास्त्रा द्वारा यथार्थ अनुवादित की गई पुस्तक से अनुवादकर्ता

के शब्दों में पढ़ें।

1 (पृष्ठ 32ए 33 पर) :-- ठहरो स्वर्ण युग (रामराज्य) आ रहा है। एक अधेड़
उम्र का औदार्य (उदार) अजोड़ महासत्ता अधिकारी भारत ही नहीं सारी पृथ्वी पर
स्वर्ण युग लाएगा और अपने सनातन धर्म का पुनरूत्थान करके यथार्थ भक्ति मार्ग
बताकर सर्वश्रेष्ठ हिन्दू राष्ट्र बनाएगा। तत्पश्चात् ब्रह्मदेश पाकिस्तान, बांगला,
श्रीलंका, नेपाल, तिब्बत (तिबेत), अफगानिस्तान, मलाया आदि देशों में वही
सार्वभौम धार्मिक नेता होगा। सत्ताधारी चांडाल चौकडि़यों पर उसकी सत्ता होगी वह
नेता (शायरन) दुनिया को अधाप मालूम होना है, बस देखते रहो।
2 (पृष्ठ 40 पर फिर लिखा है) :-- ठहरो रामराज्य (स्वर्ण युग) आ रहा है। जून
इ.स. 1999 से इ.स. 2006 तक चलने वाली उत्क्रांति में स्वर्णयुग का उत्थान होगा।
हिन्दुस्तान में उदयन होने वाला तारणहार शायरन दुनिया में सुख समृद्धि व शान्ति
प्रदान करेगा। नास्त्रोदमस जी ने निःसंदेह कहा है कि प्रकट होने वाला शायरन
(ब्भ्ल्त्म्छ) अभी ज्ञात नहीं है लेकिन वह क्रिश्चन अथवा मुस्लमान हरगिज नहीं
है। वह हिन्दू ही होगा और मैं नास्त्रोदमस उसका अभी छाती ठोक कर गर्व करता
हूं क्योंकि उस दिव्य स्वतंत्रा सूर्य शायरन का उदय होते ही सारे पहले वाले विद्वान
कहलाने वाले महान नेताओं को निष्प्रभ होकर उसके सामने नम्र बनना पडे़गा। वह
हिन्दुस्तानी महान तत्वदृष्टा संत सभी को अभूतपूर्व राज्य प्रदान करेगा। वह समान
कायदा, समान नियम बनाएगा, स्त्रा-पुरुष में, अमीर-गरीब में, जाति और धर्म में
कोई भेद-भाव नहीं रखेगा, किसी पर अन्याय नहीं होने देगा। उस तत्व दर्शी संत
का सर्व जनता विशेष सम्मान करेगी। माता-पिता तो आदरणीय होते ही हैं परन्तु
अध्यात्मिकता व पवित्राता के आधार पर उस शायरन (तत्वदर्शी संत) का
माता-पिता से भी अलग श्रद्धा स्थान होगा। नास्त्रोदमस स्वयं ज्यू वंश का था तथा
फ्रांस देश का नागरिक था। उसने क्रिश्चन धर्म स्वीकार कर रखा था, फिर भी
नास्त्रोदमस ने निःसंदेह कहा है कि प्रगट होने वाला शायरन केवल हिन्दू ही होगा।
3 (पृष्ठ 41 पर) :-- सभी को समान कायदा, नियम, अनुशासन पालन करवा
कर सत्य पथ पर लाएगा। मैं (नास्त्रोदमस) एक बात निर्विवाद सिद्ध करता हूं वह
शायरन (धार्मिक नेता) नया ज्ञान आविष्कार करेगा। वह सत्य मार्ग दर्शन करवाने
वाला तारणहार एशिया खण्ड में जिस देश के नाम महासागर (हिन्द महासागर)
है। उसी नाम वाले (हिन्दुस्तान) देश में जन्म लेगा। वह ना क्रिश्चन, ना मुस्लमान,ना ज्यू होगा वह निःसंदेह हिन्दू होगा। अन्य भूतपूर्व धार्मिक नेताओं से महतर
बुद्धिमान होगा और अजिंकय होगा। (नास्त्रोदमस भविष्यवाणी के शतक 6 श्लोक
70 में महत्वपूर्ण संकेत संदेश बता रहा है) उस से सभी प्रेम करेगें। उसका बोल
बाला रहेगा। उसका भय भी रहेगा। कोई भी अपकृत्य करना नहीं सोचेगा। उसका
नाम व कीर्ती त्रिखण्ड में गुंजेगी अर्थात् आसमानों के पार उसकी महिमा का
बोल-बाला होगा। अब तक अज्ञान निंद्रा में गाढ़े सोए हुए समाज को तत्व ज्ञान की
रोशनी से जगाएगा। सर्व मानव समाज हड़बड़ा कर जागेगा। उसके तत्व ज्ञान के
आधार से भक्ति साधना करेगा। सर्व समाज से सत्य साधना करवाएगा। जिस
कारण सर्व साधकों को अपने आदि अनादि स्थान (सत्यलोक) में अपने पूर्वजों के
पास ले जा कर वहां स्थाई स्थान प्राप्त करवाएगा (वारिस बनाएगा)। इस क्रुर भूमि
(काल लोक) से मुक्त करवाएगा, यह शब्द बोल उठेगा।
4 (पृष्ठ 42ए 43) :-- यह हिंसक क्रुरचन्द्र (महाकाल) कौन है, कहाँ है, यह बात
शायरन (तत्वदर्शी संत) ही बताएगा। उस क्रुरचन्द्र से वह ब्भ्ल्त्म्छ . शायरन ही
मुक्त करवाएगा। शायरन (तत्वदर्शी संत) के कारकिर्द में इस भूतल की पवित्रा भूमि
पर (हिन्दुस्तान में) स्वर्णयुग का अवतरण होगा, फिर वह पूरे विश्व में फैलेगा। उस
विश्व नेता और उसके सद्गुणों की, उसके बाद भी महिमा गाई जाएगी। उसके
मन की शालीनता, विनम्रता, उदारता का इतना रेल-पेल बोल बाला होगा कि
इससे पहले नमूद किए हुए शतक 6 श्लोक 70 के आखिरी पंक्ति में किया हुआ
उल्लेख कि अपना शब्द खुद ही बोल उठता है और शायरन कि ही जुबान बोल
रही है कि ‘‘शायरन अपने बारे में बस तीन ही शब्द बोलता है ’’ एक विजयी
ज्ञाता’’ इसके साथ और विशेषण न चिपकाएं मूझे मंजूर नहीं होगा। (यह पृष्ठ 42
वाला 4 उल्लेख वाणी शतक 6 श्लोक 71 है) हिन्दू शायरन अपने ज्ञान से
दैदिप्यमान उतुंग ऊंचा स्वरूप का विधान (तत्वज्ञान) फिर से बिना शर्त उजागर
करवाएगा। (ब्ीलतमद ूपसस इम बीपमि वि जीम ूवतसकए स्वअमक मिंतमक ंदक नदबींससमदहमक)
और मानवी संस्कृती निर्धोक संवारेगा, इसमें संदेह नहीं। अभी किसी को मालूम
नहीं, लेकिन अपने समय पर जैसे नरसिंह अचानक प्रगट हुआ था ऐसे ही वह विश्व
महान नेता (ळतमंज ब्ीलतमद) अपने तर्कशुद्ध, अचूक आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति
तेज से विख्यात होगा। मैं (नास्त्रोदमस) अचंभित हूँ। मैं ना उसके देश (जहां से
अवतरित होगा अर्थात् सतलोक देश) को तथा ना उसको जानता हूँ, मैं उसे सामने
देख भी रहा हूँ, उसकी महिमा का शब्द बद्ध में कोई मिसाल नहीं कर सकता।
बस उसे ळतमंज ब्ीलतमद (महान धार्मिक नेता) कहता हूँ अपने धर्म बंधुओं की सद्द
कालीन समस्या से दयनीय अवस्था से बैचेन होता हुआ स्वतंत्रा ज्ञान सूर्य का उदय
करता हुआ अपने भक्ति तेज से जग का तारणहार 5वें शतक (20 वीं सदी के
अंतिम वर्ष में) के अंत में ई.स. 1999 अधेड़ उम्र का विश्व का महान नेता जैसे
तेजस्वी सिंह मानव (ळतमंज ब्ीलतमद) उदिवग्न अवस्था से चोखट लांघता हुआ मेरे
(नास्त्रोदमस के) मन का भेद ले रहा है और मैं उसका स्वागत करता हुआ आश्चर्य चकित हो रहा हूँ, उदास भी हो रहा हूं, क्योंकि उसका दुनिया को ज्ञान न होने
से मेरा शायरन (तत्वदर्शी संत) उपेक्षा का पात्रा बन रहा है।
मेरी (नास्त्रोदमस की) चितभेदक भविष्यवाणी की और उस वैश्विक सिंह मानव
की उपेक्षा ना करें। उसके प्रकट होने पर तथा उसके तेजस्वी तत्व ज्ञान रूपी सूर्य
उदय होने से आदर्शवादी श्रेष्ठ व्यक्तियों का पुनर्उत्थान तथा स्वर्ण युग का प्रभात
शतक 6 में आज ई.स. 1555 से 450 वर्ष बाद अर्थात् 2006 में (1555़450त्र2005
के पश्चात् अर्थात् 2006 में) शुरूआत होगी। इस कृतार्थ शुरूवात का मैं
(नास्त्रोदमस) दृष्टा हो रहा हूँ।
5 (पृष्ठ 44ए 45ए 46) :-- (नास्त्रोदमस शतक 1 श्लोक 50 में फिर प्रमाणित कर
रहा है) तीन ओर से सागर से घिरे द्वीप (हिन्दुस्तान देश) में उस महान संत का
जन्म होगा उस समय तत्व ज्ञान के अभाव से अज्ञान अंधेरा होगा। नैतिकता का
पतन होकर हाहाकार मचा होगा। वह शायरन (धार्मिक नेता) गुरुवर अर्थात् गुरुजी
को वर (श्रेष्ठ) मान कर अपनी साधना करेगा तथा करवाएगा। वह धार्मिक नेता
(तत्वदर्शी सन्त) अपने धर्म बल अर्थात् भक्ति की शक्ति से तथा तत्वज्ञान द्वारा सर्व
राष्ट्रों को नतमस्तक करेगा। एशिया में उसे रोकना अर्थात् उस के प्रचार में बाधा
करना पागलपन होगा। (शतक 1 श्लोक 50)
(नोटः- नास्त्रोदमस की भविष्यवाणी फ्रांस देश की भाषा में लिखी गई थी। बाद
में एक पाल ब्रन्टन नामक अंग्रेज ने इस नास्त्रोदमस की भविष्यवाणी ‘‘सैन्चयुरी
ग्रंथ’’ को फ्रांस में कुछ वर्ष रह कर समझा, फिर इंग्लिश भाषा में लिखा। उसने
गुरुवर शब्द को (बृहस्पति) गुरुवार अर्थात् थ्रस्डे जान कर लिख दिया की वह
अपनी पूजा का आधार बृहस्पत्तिवार को बनाएगा। वास्तव में गुरुवर शब्द है
जिसका अर्थ है सर्व गुरुओं में जो एक तत्वज्ञाता श्रेष्ठ है तथा गुरु को मुख्य
मानकर साधना करना होता है। वेद भाषा में बृहस्पति का भावार्थ सर्वोच्च स्वामी
अर्थात् परमेश्वर, दूसरा अर्थ बृहस्पति का जगतगुरु भी होता है। जगत गुरु तथा
परमेश्वर भी बृहस्पति का बोध है।)
वह अधेड़ उम्र में तत्वज्ञान का ज्ञाता तथा ज्ञेय होकर त्रिखंड में कीर्ति मान
होगा। मुझ (नास्त्रोदमस) को उसका नया उपाय साधना मंत्रा ऐसा जालिम मालूम
हो रहा है जैसे सर्प को वश करने वाला गारड़ू मंत्रा से महाविषैले सर्प को वश कर
लेता है। वह नया उपाय, नया कायदा बनाने वाला तत्ववेता दुनिया के सामने
उजागर होगा उसी को मैं (नास्त्रोदमस) अचंभित होकर ’’ग्रेट शायरन‘‘ बता रहा
हूं उसके ज्ञान के दिव्य तेज के प्रभाव से उस द्वीपकल्प (भारतवर्ष) में आक्रामक
तूफान, खलबली मचेगी अर्थात् अज्ञानी संतों द्वारा विद्रोह किया जाएगा। उसको
शांत करने का उपाय भी उसी को मालूम होगा। जैसे जालिम सर्पनी को वश किया
जाता है। वह सिंह के समान शक्तिशाली व तेजपूंज व्यक्तित्व का होगा। यह मैं
नास्त्रोदमस स्पष्ट शब्दों में बता रहा हूं कि वह कुण्डलीनी शक्ति धारण किए हुए
है। आगे स्पष्ट शब्द यह है कि जिस समय वह शायरन जिस महासागर में द्वीपकल्प त
है उसी देश के नाम पर महासागर का भी नाम है (हिन्दमहासागर)। विशेषता यह
होगी की उस देश की भुजंग सर्पिनी शक्ति (कुण्डलनी शक्ति) का पूर्ण परिचित
ज्तनम डेंजमत होगा। वह ब्ीलतमद(महान धार्मिक नेता) उदारमत वाला, कृपालु,दयालु,
दैदिप्यमान, सनातन साम्राज्य अधिकारी, आदि पुरूष (सत्यपुरूष) का अनुयाई
होगा। उसकी सत्ता सार्वभौम होगी उसकी महिमा, उपाय गुरु श्रद्धा, गुरु भक्ति
अर्थात् गुरु बिना कोई साधना सफल नहीं होती, इस सिद्धांत को दृढ़ करेगा।
तत्वज्ञान का सत्संग करके प्रथम अज्ञान निंद्रा में सोए अपने धर्म बंधुओं (हिन्दुओं)
को जागृत करके अंधविश्वास के आधार पर साधना कर रहे श्रद्धालुओं को
शास्त्राविधि रहित साधना का बुरका फाड़ कर गूढ़ गहरे ज्ञान (तत्वज्ञान) का प्रकाश
करेगा। अपने सनातन धर्म का पालन करवा कर समृद्ध शांति का अधिकारी
बनाएगा। तत् पश्चात् उसका तत्वज्ञान सम्पूर्ण विश्व में फैलेगा, उस (महान
तत्वदर्शी संत) के ज्ञान की कोई भी बराबरी नहीं कर सकेगा अर्थात् उसका कोई
भी सानी नहीं होगा। उसके गूढ़ ज्ञान (तत्वज्ञान) के सामने सूर्य का तेज भी कम
पड़ेगा। इसलिए मैं (नास्त्रोदमस) वैश्विक सिंह महामानव इतना महान होगा कि मैं
उसकी महिमा को शब्दों में नहीं बांध पांउगा। मैं (नास्त्रोदमस) उस ग्रेट शायरन
को देख रहा हूँ।
उपरोक्त विवरण का भावार्थ है कि ”उस विश्व नेता को 50 वर्ष की आयु में
तत्वज्ञान शास्त्रों में प्रमाणित होगा अर्थात् वह 50 वर्ष की आयु में सन् 2001 में सर्व
धर्मो के शास्त्रों को पढ़ कर उनका ज्ञाता (तत्वज्ञानी) होगा तथा उसके पश्चात् उस
तत्वज्ञान का ज्ञेय (जानने योग्य परमेश्वर का ज्ञान अन्य को प्रदान करने वाला)
होगा तथा उसका अध्यात्मिक जन्म अमावस्या को होगा। उस समय उसकी आयु
तरुण अर्थात् 16ए 20ए 25 वर्ष की नहीं होगी, वह प्रौढ़ होगा तथा जब वह प्रसिद्ध
होगा तब उसकी आयु पचास से साठ साल के मध्य होगी।“
6 (पृष्ठ 46ए 47) :-- नास्त्रोदमस कहता है कि निःसंदेह विश्व में श्रेष्ठ तत्वज्ञाता
(ग्रेट शायरन) के विषय में मेरी भविष्यवाणी के शब्दा शब्द को किसी नेताओं पर
जोड़ कर तर्क-वितर्क करके देखेगें तो कोई भी खरा नहीं उतरेगा। मैं (नास्त्रोदमस)
छाती ठोक कर शब्दा शब्द कह रहा हूँ मेरा शायरन का कर्तृत्व और उसका
गूढ़-गहरा ज्ञान (तत्वज्ञान) ही सर्व की खाल उतारेगा, बस 2006 साल आने दो।

7 (पृष्ट 52) :-- नास्त्रोदमस ने अपनी भविष्यवाणी में कहा है कि 21 वीं सदी
के प्रारम्भ में दुनिया के क्षितिज पर ‘शायरन‘ का उदय होगा। जो भी बदलाव होगा
वह मेरी (नास्त्रोदमस की) इच्छा से नहीं बल्कि शायरन की आज्ञा से नियती की
इच्छा से सारा बदलाव होगा ही होगा। उस में से नया बदलाव मतलब हिन्दुस्तान
सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र होगा। कई सदियों से ना देखा ऐसा हिन्दुओं का सुख साम्राज्य
दृष्टिगोचर होगा। उस देश में पैदा हुआ धार्मिक संत ही तत्वदृष्टा तथा जग का
तारणहार, जगज्जेता होगा। एशिया खण्डों में रामायण, महाभारत आदि का ज्ञान जो हिन्दुओं में प्रचलित है उससे भी भिन्न आगे का ज्ञान उस तत्वदर्शी संत का
होगा। वह सतपुरुष का अनुयाई होगा। वह एक अद्वितीय संत होगा।
8ण् (पृष्ठ 74) :-- बहुत सारे संत नेता आएगें और जाएगें, सर्व परमात्मा के द्रोही
तथा अभिमानी होगें। मुझे (नास्त्रोदमस को) आंतरिक साक्षात्कार उस शायरन का
हुआ है। नास्त्रोदमस ने कहा है कि उस महान हिन्दू धार्मिक नेता को न पहचानकर
उस पर राष्ट्रद्रोह का भी आरोप लगाया जाएगा। मुझे (नास्त्रोदमस को) दुख है कि
वह महान धार्मिक नेता (ब्भ्ल्त्म्छ) उपेक्षा का पात्रा बनाया जाएगा, परंतु
हिन्दुस्तान का हिन्दू संत आगामी अंधकारी (भक्तिज्ञान के अभाव से अंधे)
प्रलयकारी (स्वार्थ वश भाई-भाई को मार रहा है, बेटा-बाप से विमुख है, हिन्दू-हिन्दू
का शत्रा, मुस्लमान-मुस्लमान का दुश्मन बना है) धुंधुकारी (माया की दौड़ में बेसब्रे
समाज) जगत को नया प्रकाश देने वाला सर्वश्रेष्ठ जगज्जेता धार्मिक विश्व नेता की
अपनी उदासी के सिवा कोई अभिलाषा नहीं होगी अर्थात् मानव उद्धार के लिए
चिन्ता के अतिरिक्त कुछ भी स्वार्थ नहीं होगा। ना अभिमान होगा, यह मेरी
भविष्यवाणी की गौरव की बात होगी की वास्तव में वह तत्वदर्शी संत संसार में
अवश्य प्रसिद्ध होगा। उसके द्वारा बताया ज्ञान सदियों तक छाया रहेगा। वह संत
आधुनिक वैज्ञानिकों की आँखें चकाचौंध करेगा ऐसे आध्यात्मिक चमत्कार करेगा कि
वैज्ञानिक भी आश्चर्य में पड़ जायेंगे। उसका सर्व ज्ञान शास्त्रा प्रमाणित होगा। मैं
(नास्त्रोदमस) कहता हूँ कि बुद्धिवादी व्यक्ति उसकी उपेक्षा न करें। उसे छोटा
ज्ञानदीप न समझें, उस तत्ववेता महामानव (शायरन को) सिहांसनस्थ करके
(आसन पर बैठाकर) उसको आराध्य देव मानकर पूजा करें। वह आदि पुरुष
(सतपुरुष) का अनुयाई दुनिया का तारणहार होगा।

”संत रामपालजी महाराजकेसमर्थन मेंअन्य भविष्यवक्ताओंकी भविष्यवाणियाँ“

1 इंग्लैण्ड के ज्योतिषी ‘कीरो’ ने सन् 1925 में लिखी पुस्तक में भविष्यवाणी की

है, बीसवीं सदी अर्थात् सन् 2000 ई. के उत्तरार्द्ध में (सन् 1950 के पश्चात् उत्पन्न
सन्त) ही विश्व में ‘एक नई सभ्यता’ लाएगा जो सम्पूर्ण विश्व में फैल जावेगी।
भारत का वह एक व्यक्ति सारे संसार में ज्ञानक्रांति ला देगा।

2. भविष्यवक्ता ‘‘श्री वेजीलेटिन’’ के अनुसार 20 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में, विश्व में

आपसी प्रेम का अभाव, मानवता का Ðास, माया संग्रह की दौड़, लूट व राज नेताओं
का अन्यायी हो जाना आदि-2 बहुत से उत्पात देखने को मिलेगें। परन्तु भारत से
उत्पन्न हुई शांति भ्रातृत्व भाव पर आधारित नई सभ्यता, संसार में-देश, प्रांत और
जाति की सीमायें तोड़कर विश्वभर में अमन व चैन उत्पन्न करेगी।

3 अमेरिका की महिला भविष्यवक्ता ‘‘जीन डिक्सन’’ के अनुसार

20 वीं सदी के अंत से पहले विश्व में एक घोर हाहाकार तथा मानवता का संहार होगा। वैचारिक
युद्ध के बाद आध्यात्मिकता पर आधारित एक नई सभ्यता सम्भवतः भारत के
ग्रामीण परिवार के व्यक्ति के नेतृत्व में जमेगी और संसार से युद्ध को सदा-सदा के लिए विदा कर देगी।

4 अमेरिका के ‘‘श्री एण्डरसन’’ के अनुसार


20 वीं सदी के अन्त से पहले या 21वीं सदी के प्रथम दशक में विश्व में असभ्यता का नंगा तांडव होगा। इस बीच भारत
के एक देहात का एक धार्मिक व्यक्ति, एक मानव, एक भाषा और झण्डा की
रूपरेखा का संविधान बनाकर संसार को सदाचार, उदारता, मानवीय सेवा व प्यार
का सबक देगा। यह मसीहा सन् 1999 तक विश्व में आगे आने वाले हजारों वर्षों
के लिए धर्म व सुख-शांति भर देगा।

5  हॉलेंड के भविष्यदृष्टा ‘‘श्री गेरार्ड क्राइसे’’ के अनुसार


20 वीं सदी के अन्त से पहले या 21 वीं सदी के प्रथम दशक में भयंकर युद्ध के कारण कई देशों का
अस्तित्व ही मिट जावेगा। परन्तु भारत का एक महापुरूष सम्पूर्ण विश्व को मानवता
के एक सूत्रा में बांध देगा व हिंसा, फूट-दुराचार, कपट आदि संसार से सदा के लिए
मिटा देगा।

6 अमेरिका के भविष्वक्ता ‘‘श्री चार्ल्स क्लार्क’’ के अनुसार


20 वीं सदी के अन्त से पहले एक देश विज्ञान की उन्नति में सब देशों को पछाड़ देगा परन्तु भारत की
प्रतिष्ठा विशेषकर इसके धर्म और दर्शन से होगी, जिसे पूरा विश्व अपना लेगा, यह
धार्मिक क्रांति 21 वीं सदी के प्रथम दशक में सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करेगी और
मानव को आध्यात्मिकता पर विवश कर देगी।

7 हंगरी की महिला ज्योतिषी ‘‘बोरिस्का’’ के अनुसार


सन् 2000 ई. से पहले-पहले उग्र परिस्थितियों हत्या और लूटमार के बीच ही मानवीय सद्गुणों का
विकास एक भारतीय फरिश्ते के द्वारा भौतिकवाद से सफल संघर्ष के फलस्वरूप
होगा, जो चिरस्थाई रहेगा, इस आध्यात्मिक व्यक्ति के बड़ी संख्या में छोटे-छोटे
लोग ही अनुयायी बनकर भौतिकवाद को आध्यात्मिकता में बदल देगें।

8 फ्रांस के डॉ. जूलर्वन के अनुसार


सन् 1990 के बाद योरोपीय देश भारत की
धार्मिक सभ्यता की ओर तेजी से झूकेंगे। सन् 2000 तक विश्व की आबादी 640
करोड़ के आस-पास होगी। भारत से उठी ज्ञान की धार्मिक क्रांति नास्तिकता का
नाश करके आँधी तूफान की तरह सम्पूर्ण विश्व को ढक लेगी। उस भारतीय महान
आध्यात्मिक व्यक्ति के अनुयाई देखते-देखते एक संस्था के रूप में ‘आत्मशक्ति’ से
सम्पूर्ण विश्व पर प्रभाव जमा लेंगे।

9  फ्रांस के ‘‘नास्त्रोदमस’’ के अनुसार


विश्व भर में सैनिक क्रांतियों के बाद थोड़े से ही अच्छे लोग संसार को अच्छा बनाऐंगे। जिनका महान् धर्मनिष्ठ विश्वविख्यात नेता 20 वीं सदी के अन्त और 21 वीं सदी की शुरूआत में किसी पूर्वी देश से जन्म
लेकर भ्रातृवृत्ति व सौजन्यता द्वारा सारे विश्व को एकता के सूत्रा में बांध देगा।
(नास्त्रोदमस शतक 1 श्लोक 50 में प्रमाणित कर रहा है) तीन ओर से सागर से
घिरे द्वीप में उस महान संत का जन्म होगा। उस समय तत्व ज्ञान के अभाव से
अज्ञान अंधेरा होगा। नैतिकता का पतन होकर, हाहाकार मचा होगा। वह शायरन
(धार्मिक नेता) गुरुवर अर्थात् गुरुजी को वर (श्रेष्ठ) मान कर अपनी साधना करेगा तथा करवाएगा। वह धार्मिक नेता (तत्वदर्शी सन्त) अपने धर्म बल अर्थात् भक्ति की
शक्ति से तथा तत्वज्ञान द्वारा सर्व राष्ट्रों को नतमस्तक करेगा। एशिया में उसे
रोकना अर्थात् उस के प्रचार में बाधा करना पागलपन होगा। (शतक 1 श्लोक 50)
  • (सेंचुरी-प्ए कन्ना-50)

10 इजरायल के प्रो. हरार के अनुसार भारत देश का एक दिव्य महापुरूष

मानवतावादी विचारों से सन् 2000 ई. से पहले-पहले आध्यात्मिक क्रांति की जड़े
मजबूत कर लेगा व सारे विश्व को उनके विचार सुनने को बाध्य होना पड़ेगा।
भारत के अधिकतर राज्यों में राष्ट्रपति शासन होगा, पर बाद में नेतृत्व धर्मनिष्ठ
वीर लोगों पर होगा। जो एक धार्मिक संगठन के आश्रित होगें।
11 नार्वे के श्री आनन्दाचार्य की भविष्यवाणी के अनुसार, सन् 1998 के बाद
एक शक्तिशाली धार्मिक संस्था भारत में प्रकाश में आवेगी, जिसके स्वामी एक
गृहस्थ व्यक्ति की आचार संहिता का पालन सम्पूर्ण विश्व करेगा। धीरे-धीरे भारत
औद्योगिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से विश्व का नेतृत्व करेगा और उसका
विज्ञान (आध्यात्मिक तत्वज्ञान) ही पूरे विश्व को मान्य होगा।
उपरोक्त भविष्यवाणियों के अनुसार ही आज विश्व में घटनाएँ घट रही हैं। युग
परिवर्तन प्रकृति का अटल सिद्धांत है। वैदिक दर्शन के अनुसार चार युगों- सतयुग,
त्रोतायुग, द्वापर और कलयुग की व्यवस्था है। जब पृथ्वी पर पापियों का एक छत्रा
साम्राज्य हो जाता है तब भगवान पृथ्वी पर मानव रूप में प्रकट होता है।
मानवता के इस पूर्ण विकास का काम अनादि काल से भारत ही करता आया
है। इसी पुण्यभूमि पर अवतारों का अवतरण अनादि काल से होता आ रहा है।
लेकिन कैसी विडम्बना है कि ऋषि-मुनियों महापुरूषों व अवतारों के जीवन
काल में उस समय के शासन व्यवस्था व जनता ने उनकी दिव्य बातों व आदर्शों
पर ध्यान नहीं दिया और उनके अन्तर्ध्यान होने पर दूगने उत्साह से उनकी पूजा
शुरू कर पूजने लग गये। यह भी एक विडम्बना कि हम जीवंत और समय रहते
उनकी नहीं मानते अपितु उनका विरोध व अपमान ही करते रहे हैं। कुछ स्वार्थी
तत्व जनता को भ्रमित करके परम सन्त को बदनाम करके बाधक बनते हैं। यह
उक्ति हर युग में चरितार्थ होती आई है, और आज भी हो रही है।

जो महापुरूष हजारों कष्टों को सहन कर अपनी तपस्या व सत्य पर अडिग
रहता है उनकी बात असत्य नहीं हो सकती। सत्य पर अडिग रहते हुए ईसा मसीह
ने अपने शरीर में कीलों की भयंकर पीड़ा को झेला, सुकरात ने जहर का प्याला
पिया, श्री राम तथा श्री कृष्ण जी को भी यातनाओं का शिकार होना पड़ा।
ईसा मसीह ने कहा था कि- ‘‘पृथ्वी और आकाश टल सकते हैं, सूर्य का अटल
सिद्धांत है उदय-अस्त, वो भी निरस्त हो सकता है, लेकिन मेरी बातें कभी झूठी
नहीं हो सकती है।’’
सज्जनों ! यदि आज के करोड़ों मानव उस परमतत्व के ज्ञाता सन्त को ढूंढकर,
स्वीकार कर, उनके बताए पथानुसार, अपनी जीवन शैली को सुधार लेंगे तो पूरे
विश्व में सद्भावना, आपसी भाई-चारा, दया तथा सद्भक्ति का वातावर्ण हो
जाएगा। वर्तमान का मानव बुद्धिजीवी है इसलिए उस सन्त के विचारों को अवश्य
स्वीकार करेगा तथा धन्य होगा। वह सन्त है जगत् गुरु तत्वदर्शी सन्त रामपाल
जी महाराज। कृप्या पढ़ें सन्त रामपाल जी महाराज की संक्षिप्त जीवनी जो सर्व
भविष्यवाणियों पर खरी उतर रही है।
”संत रामपाल जी महाराज का संक्षिप्त परिचय“
संत रामपाल जी का जन्म 8 सितम्बर 1951 को गांव धनाना जिला सोनीपत
हरियाणा में एक किसान परिवार में हुआ। पढ़ाई पूरी करके हरियाणा प्रांत में
सिंचाई विभाग में जूनियर इंजिनियर की पोस्ट पर 18 वर्ष कार्यरत रहे। सन् 1988
में परम संत रामदेवानंद जी से दीक्षा प्राप्त की तथा तन-मन से सक्रिय होकर
स्वामी रामदेवानंद जी द्वारा बताए भक्ति मार्ग से साधना की तथा परमात्मा का
साक्षात्कार किया।
संत रामपाल जी को नाम दीक्षा 17 फरवरी 1988 को फाल्गुन महीने की
अमावस्या को रात्रा में प्राप्त हुई। उस समय संत रामपाल जी महाराज की आयु
37 वर्ष थी। उपदेश दिवस (दीक्षा दिवस) को संतमत में उपदेशी भक्त का
आध्यात्मिक जन्मदिन माना जाता है।
उपरोक्त विवरण श्री नास्त्रोदमस जी की उस भविष्यवाणी से पूर्ण मेल खाता है
जो पृष्ठ संख्या 44.45 पर लिखी है। ”जिस समय उस तत्वदृष्टा शायरन का
आध्यात्मिक जन्म होगा उस दिन अंधेरी अमावस्या होगी। उस समय उस विश्व
नेता की आयु 16ए 20ए 25 वर्ष नहीं होगी, वह तरुण नहीं होगा, बल्कि वह प्रौढ़ होगा
और वह 50 और 60 वर्ष के बीच की उम्र में संसार में प्रसिद्ध होगा। वह सन् 2006
होगा।“
सन् 1993 में स्वामी रामदेवानंद जी महाराज ने आपको सत्संग करने की आज्ञा
दी तथा सन् 1994 में नामदान करने की आज्ञा प्रदान की। भक्ति मार्ग में लीन होने
के कारण जे.ई. की पोस्ट से त्यागपत्रा दे दिया जो हरियाणा सरकार द्वारा 16.5.
2000 को पत्रा क्रमांक 3492.3500, तिथि 16.5.2000 के तहत स्वीकृत है। सन 1994 से 1998 तक संत रामपाल जी महाराज ने घर-घर, गांव-गांव, नगर-नगर में
जाकर सत्संग किया। बहु संख्या में अनुयाई हो गये। साथ-साथ ज्ञानहीन संतों का
विरोध भी बढ़ता गया। सन् 1999 में गांव करौंथा जिला रोहतक (हरियाणा) में
सतलोक आश्रम करौंथा की स्थापना की तथा एक जून 1999 से 7 जून 1999 तक
परमेश्वर कबीर जी के प्रकट दिवस पर सात दिवसीय विशाल सत्संग का आयोजन
करके आश्रम का प्रारम्भ किया तथा महीने की प्रत्येक पूर्णिमा को तीन दिन का
सत्संग प्रारम्भ किया। दूर-दूर से श्रद्धालु सत्संग सुनने आने लगे तथा तत्वज्ञान को
समझकर बहुसंख्या में अनुयाई बनने लगे। चंद दिनों में संत रामपाल महाराज जी
के अनुयाइयों की संख्या लाखों में पहुंच गई। जिन ज्ञानहीन संतों व ऋषियों के
अनुयाई संत रामपाल जी के पास आने लगे तथा अनुयाई बनने लगे फिर उन
अज्ञानी आचार्यों तथा सन्तों से प्रश्न करने लगे कि आप सर्व ज्ञान अपने सद्ग्रंथों
के विपरीत बता रहे हो।
यजुर्वेद अध्याय 8 मंत्रा 13 में लिखा है कि पूर्ण परमात्मा अपने भक्त के सर्व
अपराध (पाप) नाश (क्षमा) कर देता है। आपकी पुस्तक जो हमने खरीदी है उसमें
लिखा है कि ‘‘परमात्मा अपने भक्त के पाप क्षमा (नाश) नहीं करता। आपकी
पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 7 में लिखा है कि सूर्य पर पृथ्वी की तरह मनुष्य
तथा अन्य प्राणी वास करते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी की तरह सर्व पदार्थ हैं। बाग,
बगीचे, नदी, झरने आदि, क्या यह सम्भव है। पवित्रा यजुर्वेद अध्याय 5 मंत्रा 1 में
लिखा है कि परमात्मा सशरीर है। अग्ने तनुः असि। विष्णवै त्वां सोमस्य तनुर्
असि।। इस मंत्रा में दो बार गवाही दी है कि परमेश्वर सशरीर है। उस अमर पुरुष
परमात्मा का सर्व के पालन करने के लिए शरीर है अर्थात् परमात्मा जब अपने
भक्तों को तत्वज्ञान समझाने के लिए कुछ समय अतिथि रूप में इस संसार में आता
है तो अपने वास्तविक तेजोमय शरीर पर हल्के तेजपुंज का शरीर ओढ कर आता
है। इसलिए उपरोक्त मंत्रा में दो बार प्रमाण दिया है। इस तरह के तर्क से निरूत्तर
होकर अपने अज्ञान का पर्दा फास होने के भय से उन अंज्ञानी संतों, महंतों व
आचार्यो ने सतलोक आश्रम करौंथा के आसपास के गांवों में संत रामपाल जी
महाराज को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार करना प्रारम्भ कर दिया तथा 12.7.
2006 को संत रामपाल को जान से मारने तथा आश्रम को नष्ट करने के लिए आप
तथा अपने अनुयाइयों से सतलोक आश्रम पर आक्रमण करवाया। पुलिस ने रोकने
की कोशिश की जिस कारण से कुछ उपद्रवकारी चोटिल हो गये। सरकार ने
सतलोक आश्रम को अपने आधीन कर लिया तथा संत रामपाल जी महाराज व कुछ
अनुयाइयों पर झूठा केस बना कर जेल में डाल दिया। इस प्रकार 2006 में संत
रामपाल जी महाराज विख्यात हुए। भले ही अंजानों ने झूठे आरोप लगाकर संत को
प्रसिद्ध किया परन्तु संत निर्दोष है। प्रिय पाठको (नास्त्रोदमस) की भविष्यवाणी को
पढ़कर सोचेगें कि संत रामपाल जी को इतना बदनाम कर दिया है, कैसे संभव
होगा कि विश्व को ज्ञान प्रचार करेगा। उनसे प्रार्थना है कि परमात्मा पल में  परिस्थिती बदल सकता है।
कबीर, साहेब से सब होत है, बंदे से कछु नांहि।
 राई से पर्वत करे, पर्वत से फिर राई।।
परमेश्वर कबीर जी अपने बच्चों के उद्धार के लिए शीघ्र ही समाज को तत्वज्ञान
द्वारा वास्तविकता से परिचित करवाएंगे, फिर पूरा विश्व संत रामपाल जी महाराज
के ज्ञान का लोहा मानेगा।
संत रामपाल जी महाराज सन् 2003 से अखबारों व टी वी चैनलों के माध्यम
से सत्य ज्ञान का प्रचार कर अन्य धर्म गुरुओं से कह रहे हैं कि आपका ज्ञान
शास्त्राविरूद्ध अर्थात् आप भक्त समाज को शास्त्रारहित पूजा करवा रहे हैं और दोषी
बन रहे हैं। यदि मैं गलत कह रहा हूँ तो इसका जवाब दो आज तक किसी भी
संत ने जवाब देने की हिम्मत नहीं की।
संत रामपाल जी महाराज को ई.सं. (सन्) 2001 में अक्तुबर महीने के प्रथम
बृहस्पतिवार को अचानक प्रेरणा हुई कि ”सर्व धर्मां के सद्ग्रन्थों का गहराई से
अध्ययन कर” इस आधार पर सर्वप्रथम पवित्रा श्रीमद् भगवद्गीता जी का अध्ययन
किया तथा पुस्तक ‘गहरी नजर गीता में‘ की रचना की तथा उसी आधार पर
सर्वप्रथम राजस्थान प्रांत के जोधपुर शहर में मार्च 2002 में सत्संग प्रारंभ किया।
इसलिए नास्त्रोदमस जी ने कहा है कि विश्व धार्मिक हिन्दू संत (शायरन) पचास
वर्ष की आयु में अर्थात् 2001 ज्ञेय ज्ञाता होकर प्रचार करेगा। संत रामपाल जी
महाराज का जन्म पवित्रा हिन्दू धर्म में सन् (ई.सं.) 1951 में 8 सितम्बर को गांव
धनाना जिला सोनीपत, प्रांत हरियाणा (भारत) में एक किसान परिवार में हुआ।
इस प्रकार सन् 2001 में संत रामपाल जी महाराज की आयु पचास वर्ष बनती है,
सो नास्त्रोदमस के अनुसार खरी है। इसलिए वह विश्व धार्मिक नेता संत रामपाल
जी महाराज ही हैं जिनकी अध्यक्षता में भारतवर्ष पूरे विश्व पर राज्य करेगा। पूरे
विश्व में एक ही ज्ञान (भक्ति मार्ग) चलेगा। एक ही कानून होगा, कोई दुःखी नहीं
रहेगा, विश्व में पूर्ण शांति होगी। जो विरोध करेंगे अंत में वे भी पश्चाताप करेंगे
तथा तत्वज्ञान को स्वीकार करने पर विवश होंगे और सर्व मानव समाज मानव धर्म
का पालन करेगा और पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सतलोक जाएंगे।
जिस तत्वज्ञान के विषय में नास्त्रोदमस जी ने अपनी भविष्यवाणी में उल्लेख
किया है कि उस विश्व विजेता संत के द्वारा बताए शास्त्रा प्रमाणित तत्व ज्ञान के
सामने पूर्व के सर्व संत निष्प्रभ (असफल) हो जाएंगे तथा सर्व को नम्र होकर झुकना
पड़ेगा। उसी के विषय में परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी ने अपनी अमृत वाणी में
पवित्रा ‘कबीर सागर‘ ग्रंथ में (जो संत धर्मदास जी द्वारा लगभग 550 वर्ष पूर्व
लीपीबद्ध किया गया है) कहा है कि एक समय आएगा जब पूरे विश्व में मेरा ही
ज्ञान चलेगा। पूरा विश्व शांति पूर्वक भक्ति करेगा। आपस में विशेष प्रेम होगा,
सतयुग जैसा समय (स्वर्ण युग) होगा। परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ द्वारा बताए ज्ञान
को संत रामपाल जी महाराज ने समझा है। इसी ज्ञान के विषय में कबीर साहेब जी ने अपनी वाणी में कहा है कि --
कबीर, और ज्ञान सब ज्ञानड़ी, कबीर ज्ञान सो ज्ञान।
 जैसे गोला तोब का, करता चले मैदान।।
भावार्थ है कि यह तत्वज्ञान इतना प्रबल है कि इसके समक्ष अन्य संतों व
ऋषियों का ज्ञान टिक नहीं पाएगा। जैसे तोब यंत्रा का गोला जहां भी गिरता है वहां
पर सर्व किलों तक को ढहा कर साफ मैदान बना देता है।
यही प्रमाण संत गरीबदास जी (छुड़ानी, जिला झज्जर, हरियाणा वाले) ने दिया
है कि सतगुरु (तत्वदर्शी संत परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ का भेजा हुआ) दिल्ली
मण्डल में आएगा।
 ”गरीब, सतगुरु दिल्ली मण्डल आयसी, सूती धरणी सूम जगायसी“
परमात्मा की भक्ति बिना कंजूस हो गए व्यक्तियों को जगाएगा। गांव धनाना,
जिला सोनीपत पहले दिल्ली शासित क्षेत्रा में पड़ता था। इसलिए संत गरीबदास जी
महाराज ने कहा है कि सतगुरु (वास्तविक ज्ञान जानने वाला संत अर्थात् तत्व दृष्टा
संत) दिल्ली मण्डल में आएगा फिर कहा है कि -
 ”साहेब कबीर तख्त खवासा, दिल्ली मण्डल लीजै वासा“
भावार्थ है कि परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ के तख्त (दरबार) का ख्वास (नौकर)
अर्थात् परमेश्वर का नुमायंदा (प्रतिनिधि) दिल्ल मण्डल में वास करेगा अर्थात् वहां
उत्पन्न होगा। प्रथम अपने हिन्दू बंधुओं को तत्वज्ञान से परिचित करवाएगा।
बुद्धिमान हिन्दू ऐसे जागेंगे जैसे कोई हड़बड़ा कर जागता है अर्थात् उस संत के
द्वारा बताए तत्व ज्ञान को समझ कर अविलम्ब उसकी शरण ग्रहण करेंगे। फिर पूरा
विश्व उस तत्वदर्शी हिन्दू संत के ज्ञान को स्वीकार करेगा। यह भविष्यवाणी श्री
नास्त्रोदमस जी ने भी की है। नास्त्रोदमस जी ने यह भी लिखा है कि मुझे दुःख इस
बात का है कि उससे परिचित न होने के कारण मेरा शायरन (तत्वदृष्टा संत)
उपेक्षा का पात्रा बना है। हे बुद्धिमान मानव ! उसकी उपेक्षा ना करो। वह तो
सिंहासनस्थ करके (आसन पर बैठा कर) अराध्य देव (इष्टदेव) रूप में मान करने
योग्य है। वह हिन्दू धार्मिक संत शायरन आदि पुरुष (पूर्ण परमात्मा) का अनुयाई
जगत् का तारणहार है।
नास्त्रोदमस जी भविष्य वक्ता ने पुस्तक पृष्ठ 41.42 पर तीन शब्द का उल्लेख
किया है। कहा है कि वह विश्व विजेता तत्वदृष्टा संत क्रुरचन्द्र अर्थात् काल की
दुःखदाई भूमि से छुड़ा कर अपने आदि अनादि पूर्वजों के साथ वारिस बनाएगा तथा
मुक्ति दिलाएगा। यहां पर उपदेश मंत्रा की ओर संकेत है कि वह शायरन केवल
तीन शब्द (ओम्-तत्-सत्) ही मंत्रा जाप देगा। इन तीन शब्दों के साथ मुक्ति का
कोई अन्य शब्द न चिपकाएगा। यही प्रमाण पवित्रा ऋग्वेद मण्डल 10 सूक्त 90 मंत्रा
16 में, सामवेद श्लोक संख्या 822 तथा श्रीमद् भगवत् गीता अध्याय 17 श्लोक 23
में है कि पूर्ण संत (तत्वदर्शी संत) तीन मंत्रा (ओम्-तत्-सत् जिनमें तत् तथा सत्
सांकेतिक हैं) दे कर पूर्ण परमात्मा (आदि पुरुष) की भक्ति करवा कर जीव को काल-जाल से मुक्त करवाता है। फिर वह साधक की भक्ति कमाई के बल से वहां
चला जाता है जहां आदि सृष्टी के अच्छे प्राणी रहते हैं। जहां से यह जीव अपने
पूर्वजों को छोड़ कर क्रुरचन्द्र (काल प्रभु) के साथ आकर इस दुःखदाई लोक में फंस
कर कष्ट पर कष्ट उठा रहा है। नास्त्रोदमस जी ने यह भी स्पष्ट किया है कि मध्य
काल अर्थात् बिचली पीढ़ी हिन्दू धर्म का आदर्श जीवन जीएंगे। शायरन (तत्वदृष्टा
संत) अपने ज्ञान से दैदिप्यमान उतंग ऊँचा स्वरूप अर्थात् सर्व श्रेष्ठ शास्त्रानुकूल
भक्ति विधान फिर से बिना शर्त उजागर करवाएगा ओर मानवी संस्कृति अर्थात्
मानव धर्म के लक्षण निर्धोक (निष्कपट भाव से) संवारेगा। (मधल्या कालात हिन्दू
धर्मांचे व हिन्दुच्या आदर्शवत् झालेल - यह मराठी भाषा में पृष्ठ 42 पर लिखा है
कि उपरोक्त भावार्थ है कि बिचली पीढ़ी का उद्धार शायरन करेगा। यह उल्लेख
पृष्ठ 42 की हिन्दी लिखना रह गया था इसलिए यहां लिख दिया है तथा
स्पष्टीकरण भी दिया है। यही प्रमाण स्वयं पूर्ण परमात्मा कबीर जी ने कहा है कि
धर्मदास तोहे लाख दुहाई, सारज्ञान व सारशब्द कहीं बाहर न जाई।
सारनाम बाहर जो परही, बिचली पीढ़ी हंस नहीं तर ही।।
सारज्ञान तब तक छुपाई, जब तक द्वादस पंथ न मिट जाई)।
जैसे ई.सं.(सन्) 1947 में भारतवर्ष अंग्रेजों से मुक्त हुआ। उससे पहले
हिन्दुस्तान में शिक्षा नहीं थी। सन् 1951 में संत रामपाल जी महाराज को परमेश्वर
जी ने पृथ्वी पर भेजा। सन् 1947 से पहले कलियुग की प्रथम पीढ़ी जानें तथा
1947 से बिचली पीढ़ी प्रारम्भ हुई है। यह एक हजार वर्ष तक सत्य भक्ति करेगी।
इस दौरान जो पूर्ण निश्चय के साथ भक्ति करेगा वह सतलोक चला जाएगा। जो
सतलोक नहीं जा सके तथा कभी भक्ति की, कभी छोड़ दी, परंतु गुरु द्रोही नहीं
हुए वे फिर हजारों मनुष्य जन्म इसी कलियुग में प्राप्त करेंगे क्योंकि यह उनकी
शास्त्राविधि अनुसार साधना का परिणाम होगा। इस प्रकार कई हजारों वर्षों तक
कलियुग का समय वर्तमान से भी अच्छा चलेगा। फिर अंत की पीढ़ी भक्ति रहित
उत्पन्न होगी क्योंकि शुभ कमाई जो भक्ति युग में की है वह बार-2 जन्म प्राप्त
करके खर्च (समाप्त) कर दी होगी। इस प्रकार कलियुग के अंत की पीढ़ी कृतघनी
होगी। वे भक्ति नहीं कर सकेंगी। इसलिए कहा है कि अब कलियुग की बिचली
पीढ़़ी चल रही है (1947 से)। सन् 2006 से वह शायरन सर्व के समक्ष प्रकट हो चुका
है, वह है ”संत रामपाल जी महाराज“।
उपरोक्त ज्ञान जो बिचली पीढ़ी व प्रथम तथा अंतिम पीढ़ी वाला संत रामपाल
जी महाराज अपने प्रवचनों में वर्षों से बताते आ रहे हैं जो अब नास्त्रोदमस जी की
भविष्यवाणी ने भी स्पष्ट कर दिया। इसलिए संत गरीबदास जी महाराज ने कहा
है कि - कबीर परमेश्वर की भक्ति पूर्ण संत से उपदेश लेकर करो नहीं तो यह
अवसर फिर हाथ नहीं आएगा।
गरीब, समझा है तो सिर धर पांव, बहुर नहीं रे ऐसा दाव।।
भावार्थ है कि यदि आप तत्वज्ञान को समझ गए हैं तो सिर पर पैर रख अर्थात अतिशिघ्रता से तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज से उपदेश लेकर अपना कल्याण
करवाओ। यह सुअवसर फिर प्राप्त नहीं होगा। जैसे यह बिचली पीढ़ी (मध्य काल)
वाला समय और आपका मानव शरीर तथा तत्वदृष्टा संत प्रकट है। यदि अब भी
भक्ति मार्ग पर नहीं लगोगे तो उसके विषय में कहा है कि --
 यह संसार समझदा नांही, कहंदा श्याम दुपहरे नूं।
 गरीबदास यह वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूं।।
भावार्थ है कि संत गरीबदास जी महाराज कह रहे हैं कि यह भोला संसार
शास्त्राविधि रहित साधना कर रहा है जो अति दुःखदाई है, इसी को सुखदाई कह
रहा है। जैसे जून मास दोपहर (दिन के बारह बजे) में धूप में खड़ा-2 जल रहा
है उसी को सांय बता रहा है। जैसे कोई शराबी व्यक्ति शराब पीकर सड़क पर पड़ा
है और उससे कोई कहे कि आप दोपहर की धूप में क्यों जल रहे हो, छांया में चलो।
वह शराब के नशे में कहता है कि नहीं सांय है, कौन कहता है कि दोपहर है ?
इसी प्रकार जो साधक शास्त्राविधि त्याग कर मनमाना आचरण कर रहे हैं वे अपना
जीवन नष्ट कर रहे हैं। उसे त्यागना नहीं चाहते अपितु उसी को सर्व श्रेष्ठ मानकर
काल के लोक की आग में जल रहे हैं। संत गरीबदास जी महाराज कह रहे हैं कि
इतने प्रमाण मिलने के पश्चात् भी सतसाधना पूर्ण संत के बताए अनुसार नहीं करोगे
तो यह अनमोल मानव शरीर तथा बिचली पीढ़ी का भक्ति युग हाथ से निकल
जाएगा फिर इस समय को याद करके रोवोगे, बहुत पश्चाताप करोगे। फिर कुछ
नहीं बनेगा। परमेश्वर कबीर जी बन्दी छोड़ ने कहा है कि -
 आच्छे दिन पाछै गए, सतगुरु से किया ना हेत।
 अब पछतावा क्या करे, जब चिडि़या चुग गई खेत।।
सर्व मानव समाज से प्रार्थना करते हैं कि पूर्ण संत रामपाल जी महाराज को
पहचानों तथा अपना व अपने परिवार का कल्याण करवाओ। अपने रिश्तेदारों तथा
दोस्तों को भी बताओ तथा पूर्ण मोक्ष पाओ। स्वर्ण युग प्रारम्भ हो चुका है। लाखों
पुण्य आत्मांए संत रामपाल जी तत्वदर्शी संत को पहचान कर सत्य भक्ति कर रहे
हैं, वे अति सुखी हो गए हैं। सर्व विकार छोड़ कर निर्मल जीवन जी रहे हैं।

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Tuesday, May 12, 2020

"बीमारियों के कारण ओर उनका स्थायी आधात्मिक ईलाज"

★ "बीमारी किन कारणों से आती है"

बीमारी मनुष्य को उसके पिछले कर्म दंड के आधार पर आती वर्तमान में जो मनुष्य सुखी है उनको किसी भी प्रकार की कोई पीड़ा नहीं है वह पिछले जन्मों के अच्छे पुण्य कर्मी आत्मा हैं जिनके पुण्य अच्छे होने के कारण उनको कोई भी दुख नहीं है और वर्तमान में कुछ ऐसे लोग हैं जो कि ना ना प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हैं वो बहुत काफी इलाज भी करा लिया फिर भी ठीक नहीं होती है ठीक इसलिए नहीं होते है क्योंकि उनके अब पुण्य खत्म हो गये है और उन्होंने जो पिछले जन्म में कर्म किए थे पाप किए थे उन पापों का दंड उस व्यक्ति को अब मिल रहा है इसलिए उस पर अब कोई भी दवाई काम नहीं करती अगर हम आध्यात्मिक मार्ग से देखें तो इस लोक का विधान है की जो व्यक्ति जैसे कर्म करेगा उसको वैसा ही फल मिलेगा इसलिए अधिकतर व्यक्ति दुखी रहते हैं उनको लाइलाज बीमारी लग जाती है वह कभी ठीक नहीं होती है अंत में मृत्यु को प्राप्त होते हैं


वर्तमान समय में जगतगुरु संत रामपाल जी महाराज जी एकमात्र ऐसे संत हैं जो कि सभी शास्त्रों के अनुसार भक्ति बताते हैं इससे इससे भक्ति करने वाले भक्तों को पूर्ण लाभ मिलता है सत भक्ति करने से पाप कर्मों का नाश हो जाता आज संत रामपाल जी महाराज जी इस संसार में सत भक्ति प्रदान कर रहे हैं और उनसे नाम लेने वाले भक्तों को ऐसे ऐसे लाभ हो रहे जैसे कि कोई कैंसर से पीड़ित है और कोई भी अन्य भयानक बीमारी से ग्रसित है वह भी बिल्कुल स्वस्थ हो रहे हैं सत भक्ति करने से क्योंकि सत भक्ति करने से पाप कर्म नष्ट हो जाते है


★ "लाइलाज बीमारियों का निवारण कैसे होगा
आखिर लाईलाज बीमारियों का इलाज सत भक्ति करने से होगा क्योंकि अगर हम सत भक्ति करेंगे तो हमारे पाप कर्म नष्ट हो जाएंगे और फिर हम सुखी और स्वस्थ हो जाएंगे सत भक्ति इस पूरे संसार में केवल एकमात्र तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के पास है और उनके जितने भी शिष्य हैं उन सब को आध्यात्मिक लाभ हो रहा है जो पहले बहुत दुखी थे फिर सुखी हो गए है भक्ति करने से तो क्यों ना पूरा संसार सत भक्ति करें संत रामपाल जी महाराज जी के सानिध्य में आज वर्तमान समय में कोरोना जैसी भयानक बीमारी पूरे विश्व में फैल चुकी है जिससे लाखों लोग मर चुके इसका अभी तक कोई भी इलाज नहीं अगर पूरा संसार सत भक्ति करने लग जाएगा तो कोरोना वायरस बीमारी से भी ठीक हो जाएंगे क्योंकि सत भक्ति करने से संपूर्ण पापों का नाश हो जाता है फिर व्यक्ति सुखी हो जाता है



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Friday, May 8, 2020

कथा:- "सुदामा जी को धनी बनाया"

श्री कृष्ण जी ने सुदामा जी को धनी बना दिया 

श्री कृष्ण जी तथा ब्राह्मण सुदामा जी सहपाठी (class fellow) थे। शिक्षा काल में दोनों की घनिष्ठ मित्राता थी। शिक्षा उपरांत श्री कृष्ण जी द्वारिका के राजा बने ओर सुदामा जी अपना पारंपरिक कार्य कर्मकाण्ड करके यजमानी करने लगे। वे वास्तव में ब्राह्मण थे। ग्रन्थों के ज्ञान के अनुसार अपने जीवन को चलाते थे। परंतु ऋषियों को ही ग्रन्थों के गूढ़ रहस्य
का ज्ञान नहीं था। इस कारण से साधना शास्त्राविधि त्यागकर मनमाना आचरण जो गुरूजनों
ने बताया हुआ था, वही करते थे जिससे वर्तमान में कोई लाभ नहीं हो रहा था। श्री सुदामा
जी किसी यजमान को भ्रमित करके रूपये या अन्य पदार्थ नहीं लेते थे। केवल अपना व
परिवार का भोजन तथा कपड़े यदि आवश्यकता हुई तो लेते थे। कुछ दिन कोई क्रियाकर्म
करवाने वाला नहीं आया। भोजन की समस्या पूरे परिवार को हो गई। सुदामा जी की पत्नी
ने कहा कि आपके चार पुत्रा छोटे-छोटे हैं। भूख से बेहाल हैं। आप कहते हो कि द्वारिकाधीश
श्री कृष्ण मेरे मित्रा हैं। वे द्वारिका के राजा हैं। आप कुछ धन माँग लाओ। वे आपको मना नहीं करेंगे क्योंकि आप कहते हो कि शिक्षा काल में वे आपके परम मित्र थे। वे आपके साथ घर आते थे और इकट्ठा खाना खाते थे। सुदामा जी ने कहा कि ब्राह्मण माँगता नहीं। अपने कार्य कर्मकाण्ड करके दक्षिणा ले सकता है। श्री कृष्ण मेरे यजमान भी नहीं हैं। इसलिए मेरा सिर नीचा हो जाएगा। यदि मित्राता समाप्त करनी हो तो मित्रा से कहो, कुछ दो। यह गलती सुदामा विप्र नहीं कर सकता, भूखा मर सकता है।
 शास्त्रों में लिखा है कि जिसने पूर्व जन्म में दान-धर्म नहीं किया। वह अगले जन्म मे निर्धन रहता है। मैंने पूर्व जन्म में कोई दान नहीं किया होगा। इसलिए मैं निर्धन हूँ। मुझे धन नहीं मिल सकता। पत्नी ने चारों पुत्रों को उसके सामने खड़ा कर दिया जो एक रोटी
को एक-दूसरे से छीनने की कोशिश कर रहे थे जो मिसरानी ने छुपा रखी थी जो रात को
बासी बची थी। यह सोचा था कि एक का भी पेट नहीं भरेगा, कौन-से बच्चे को दूँ। इसलिए
उसको छुपा रखा था। वह एक लड़के के हाथ लग गई थी। उससे अन्य छीना-झपटी कर रहे थे। मिसरानी ने कहा कि आप इन बच्चों के लिए माँग लाओ। वह दृश्य देखकर सुदामा एकान्त में जाकर परमात्मा से विनय करने लगा तथा आँखों में पानी भर आया। हे प्रभु! ये क्या दिन देख रहा हूँ। मुझे पूर्व जन्म में कोई मार्गदर्शक ठीक नहीं मिला। जिस कारण से मैंने दान नहीं किया है। हे प्रभु! मुझसे ये भूखे बच्चे देखे नहीं जाते। या तो मुझे मार दो या
फिर इन चारों को अपने पास बुला लो। इतने में परमेश्वर कबीर जी एक यजमान का रूप धारण करके आए और ढे़र सारा सूखा सीधा (आटा, चावल, दाल, खाण्ड, घी नमक-मिर्च, बच्चों के कपड़े) देकर चले गए। ब्राह्मणी ने तुरंत भोजन बनाया। बच्चों को परोसा। इतने में सुदामा जी आँसू पौंछकर रसोई की ओर गया तो बच्चे खाना खा रहे थे। पूछने पर पता चला कि कोई भक्त आया था। यह सामान दान कर गया है। सुदामा जी ने पूछा कि क्या
नाम बताया था? पत्नी ने कहा कि दामोदर नाम बताया था। सुदामा जी ने अपने दिमाग
पर जोर दिया तो कोई भी दामोदर नाम का यजमान उनका नहीं था। उस नाम का कोई भी व्यक्ति नगरी में भी नहीं था। उस दिन के अतिरिक्त तीन दिन का राशन पूरे परिवार का था। पत्नी ने फिर आग्रह किया कि आप श्री कृष्ण जी से कुछ माँगकर ले आओ तो
सुदामा ने हाँ कर दी। परंतु मन में यही था कि जाकर आ जाऊँगा, माँगूगा नहीं। किसी मित्र या रिश्तेदारी में जाते समय उनके लिए घर से कुछ मिठाई बनवाकर ले जाने की परंपरा थी। उसके स्थान पर पत्नी ने तीन मुठ्ठी यानि 250 ग्राम चावल भूनकर भक्त की चद्दर के पल्ले से बाँध दिए। सुदामा जी द्वारिका में तीसरे दिन शाम को पहुँचा। मैले कपड़े, टूटी
जूती, एक भिखारी जैसे वेश में श्री कृष्ण जी के राजभवन के सामने द्वार पर खड़ा हो गया
और द्वारपाल से अंदर जाने के लिए आज्ञा चाही तो द्वारपाल ने परिचय पूछा। कौन हो?
क्या नाम है? कहाँ से आए हो? क्या काम है? यह राजा का राजभवन है। आपको किससे
मिलना है? सुदामा जी ने अपना परिचय दिया। फिर द्वारपाल ने कहा कि पहले हम महाराज
जी से आज्ञा लेकर आऐंगे, यदि आज्ञा हुई तो आपको मिलाऐंगे।
द्वारपाल ने श्री कृष्ण जी को सब पता बताया तो श्री कृष्ण नंगे पैरों सिंहासन छोड़कर दौड़े-दौड़े आए और मैले धूल भरे कपड़ों समेत सुदामा जी को गले से लगा लिया
और सिंहासन पर बैठा दिया। फिर अपने हाथों सुदामा जी के पैर धोए। नहाया, नए कपड़े पहनाए। कई प्रकार का भोजन बनवाया। खाने के लिए जो चावल सुदामा जी लाए थे, उनको बड़ी रूचि के साथ श्री कृष्ण जी ने खाया। सुदामा जी के खाने के लिए कई प्लेटों में हलवा-खीर, कई सब्जी-रोटी सामने रख दी। सुदामा जी को अपने घर का दृश्य याद आया कि आज शाम का खाना घर पर नहीं है। बच्चे भूखे बैठे हैं, रो रहे होंगे। माँ रोटी-माँ रोटी कह रहे होंगे। मैं ये पकवान कैसे खाऊँ? यदि नहीं खाऊँगा तो श्री कृष्ण जी को पता  चलेगा कि मैं कुछ माँगने आया हूँ। इसलिए एक ग्रास लेकर धीरे-धीरे खाने लगा। ऊंगलियों को बार-बार मुख में चाटकर समय बिताने लगा
परंतु श्री कृष्ण की दृष्टि तो मित्रा के मुख कमल पर थी। सब हाव-भाव देख रहे थे। कहा खाले, खाले यार सुदामा! क्यों उंगली चाटे है? सुदामा जी ने दो रोटी खाई तथा खीर-हलवा नाममात्रा खाया और हाथ धोकर बैठ गया।

श्री कृष्ण जी ने पूछा कि बच्चे तथा भाभी जी कुशल हैं। निर्वाह ठीक चल रहा है। सुदामा
जी ने कहा कि :-
 तेरी दया से है भगवन, हमको सुख सारा है। किसी वस्तु की कमी नहीं, मेरा ठीक गुजारा है।।

श्री कृष्ण जी तो समझ चुके थे कि यह मर जाएगा, माँगेगा नहीं। उसी समय सुदामा जी को दूसरे कक्ष में विश्राम के लिए निवेदन किया और राजदरबार में जाकर विश्वकर्मा जी को बुलाया जो मुख्य इन्जीनियर था तथा सुदामा जी का पूरा पता लिखाकर उसका
सुंदर महल बनाने का आदेश दिया तथा कहा कि लाखों रूपये का धन ले जा जो भक्त के
घर रख आना। यह कार्य एक सप्ताह में होना चाहिए। विश्वकर्मा जी ने छः दिन में कार्य सम्पूर्ण करके रिपोर्ट दे दी। सुदामा जी प्रतिदिन चलने के लिए कहते तो श्री कृष्ण जी विशेष विनय करके रोके रहे। सातवें दिन सुदामा चल पड़ा, नए बहुमूल्य वस्त्रा पहने हुए थे। रास्ते
में सोचता हुआ आ रहा था कि कृष्ण मेरे से पूछ रहा था कि किसी वस्तु का अभाव तो नहीं
है। क्या उसको दिखाई नहीं दे रहा था कि मेरा क्या हाल है? वही बात सही हुई कि मित्राता
समान हैसियत वालों की निभती है। इतनी देर में जंगली भीलों ने रास्ता रोक लिया और
कहा कि निकाल दे जो कुछ ले रखा है। सुदामा जी ने कहा कि मेरे पास कुछ नहीं है। भीलों
ने तलाशी ली तो कुछ नहीं मिला। सुदामा जी के कीमती धोती-कुर्ता छीन ले गए, उनको
नंगा छोड़ गए। सुदामा जी को यह सजा अविश्वास की मिली थी।
शाम को सूर्य अस्त के बाद अपनी झोंपड़ी से थोड़ी दूरी पर अंधेरे में एक वृक्ष के नीचे खड़ा होकर देखने लगा तो देखा कि झोंपड़ी उखाड़कर फैंक रखी है। उसके स्थान पर
आलीशान महल दो मंजिल का बना है। सुदामा जी दुःखी हुए कि किसी ने झोंपड़ी (कुटिया)
भी उखाड़ दी और कब्जा करके अपना मकान बना लिया। बच्चे तथा पत्नी पता नहीं कहाँ
भूख के मारे डूबकर मर गए होंगे। अब जीवित रहकर क्या करना है? मैं भी दरिया में समाधि
लेकर जीवन अंत करता हूँ। यदि परिवार जीवित भी होगा तो भूख के मारे तड़फ रहा होगा।
मेरे से देखा नहीं जाएगा। वहाँ से चलने वाला था। उसकी पत्नी महल पर खड़ी होकर अपने
पति जी के आने की बाट देख रही थी। वह विचार कर रही थी कि विप्र जी अपनी झोंपड़ी
को न पाकर कुछ बुरी न सोच लें। इसलिए द्वारिका के रास्ते पर टकटकी लगाए खड़ी थी।
उसने उसी समय एक व्यक्ति अंधेरे में खड़ा महसूस हुआ। मिसरानी शीघ्रता से दीपक लेकर
उस ओर चली। सुदामा जी वृक्ष की ओट में होकर देखने लगा कि यह स्त्रा कौन है? दीपक
लेकर कहाँ जाएगी? दीपक की रोशनी में सुदामा ने अपनी पत्नी को पहचान लिया। परंतु
महल से आई है, यह क्या माजरा है? सुदामा जी ने कहा कि दीपक बुझाओ, मैं नंगा हूँ। रास्ते में भीलों ने मेरे वस्त्रा छीन लिए जो श्री कृष्ण जी ने नए बहुत कीमती बनवाए थे। पंडितानी ने दीपक बुझा दिया। सुदामा ने पूछा कि यह महल किसने बना दिया? अपनी झोंपड़ी किसने उखाड़ दी? आप किसके महल से आई हो? नौकरानी का कार्य करने लगी
हो क्या? पंडितानी ने कहा कि हे स्वामी! यह महल आपके मित्रा कृष्ण ने बनवाया है। आपके
जाने के चौथे दिन सैंकड़ों कारीगर आए, साथ में बैलों पर पत्थर-ईटें, चूना तथा अन्न-धन
लादकर लाए थे। छः दिन में सम्पूर्ण करके चले गए। आओ! यह आपका महल है। महल
में आकर देखा तो अन्न-धन से भरपूर था। जीवनभर का सामान था। पंडितानी ने पूछा कि
आपके कपड़े क्यों उतारे? आपके पास कुछ था ही नहीं, पुराने वस्त्रा थे। उनका भील क्या
करेंगे? तब सुदामा ने सारी घटना बताई तथा अपने उस घटिया विचार की भी जानकारी
दी जो मित्रा के प्रति आया था कि मेरे से कृष्ण पूछ रहा था कि घर में किसी वस्तु की कमी
तो नहीं है। गुजारा ठीक चल रहा है क्या? मैंने कह दिया था कि आपकी कृपा से सब कुशल
है। किसी वस्तु की कमी नहीं है। निर्वाह ठीक चल रहा है। पत्नी ने कहा कि आप कहाँ माँगने
वाले हो, वे तो अंतर्यामी हैं। सब जान गए थे। सुदामा जी ने कहा कि सब जान गए थे।
इसलिए तो मेरे वस्त्रा भी छिनवा दिए। मैं विचार करता जा रहा था कि देखा! मित्रा मेरे से
पूछ रहा था कि सब ठीक तो है। किसी वस्तु की कमी तो नहीं है। मैं सोच रहा था कि क्या
उसको मेरी दशा देखकर यह नहीं पता था कि यह दशा क्या ठीक-ठाक की होती है। ठीक
ही कहा है कि मित्राता तो समान हैसियत वालों की निभती है। मैंने तो इतना विचार किया
ही था कि उसी समय मेरे वस्त्रा भी लूट लिए गए। तब मिसरानी ने कहा कि आपकी परीक्षा
ली थी, परंतु आप यहीं पर चूके थे, उसी का झटका आपको दिया। अब देख तेरे मित्रा का
कमाल। बच्चों के वस्त्रा राजाओं जैसे हैं। चार सिपाही चारों कोनों पर रखवाली कर रहे हैं।
 संत सुदामा श्री कृष्ण के संगी यानि मित्रा थे जो दारिद्र
(टोटे यानि निर्धनता) की द्ररिया (नदी) यानि अत्यधिक निर्धन व्यक्ति था। उसके चावल
खाकर कंचन (स्वर्ण) के महल बख्श दिए यानि निःशुल्क (मुफ्त में) दे दिए।
विचार :- श्री कृष्ण जी राजा थे। अपने मित्रा की इतनी सहायता करना एक राजा के
लिए कोई बड़ी बात नहीं है। इतनी सहायता तो एक प्रान्त का मंत्रा अपने मित्रा की आसानी
से कर सकता है।
परमेश्वर कबीर जी ने एक अति निर्धन मुसलमान लुहार तैमूरलंग की एक रोटी
खाकर सात पीढ़ी का राज्य बख्श दिया था। उसी जीवन में तैमूरलंग राजा बना जिसका राज्य विशाल था। दिल्ली की राजधानी पर उसने अपना प्रतिनिधि छोड़ा था। उनकी मृत्यु
के उपरांत कुछ समय दिल्ली की गद्दी पर अन्य ने कब्जा कर लिया था। फिर तैमूरलंग के
पोते बाबर ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। पहले तैमूरलंग का प्रतिनिधि दिल्ली पर बैठा
रखा था, उसकी तीसरी पीढ़ी ने अपने आपको स्वतंत्रा घोषित कर दिया। तब बाबर ने
लड़ाई करके दिल्ली का राज्य प्राप्त किया। बाबर से औरंगजेब तक छः पीढ़ी तथा प्रथम
तैमूरलंग, इस प्रकार कुल सात पीढ़ी का राज्य परमेश्वर कबीर जी ने तैमूरलंग को दिया।
1 तैमूरलंग 2 पोता बाबर। 3 हिमायुं पुत्रा बाबर 4 अकबर पुत्रा हिमायुं 5 जहांगीर
पुत्रा अकबर 6 शाहजहाँ पुत्रा जहांगीर 7 औरंगजेब पुत्रा शाहजहाँ।
विशेष भिन्नता :- जन्म-मरण का कष्ट न श्री कृष्ण का समाप्त है, न सुदामा का हुआ दोनों ही आगे के जन्मों में अन्य प्राणियों के शरीरों में जाऐंगे।
तैमूरलंग को सात पीढ़ी का राज्य भी मिला और मोक्ष भी मिला। सहायता में इतना
अंतर समझें। जैसे सहायता एक तो प्रान्त का मंत्रा करे, दूसरा देश का प्रधानमंत्रा करे।
कबीर जी यानि सतपुरूष को प्रधानमंत्रा जानो और श्री कृष्ण जी (श्री विष्णु जी) को प्रान्त
का मंत्रा जानो। फिर भी बात भक्ति की चल रही है। कबीर जी ने कहा है कि :-
कबीर, जो जाकी शरणा बसै, ताको ताकी लाज। जल सोंही मछली चढ़ै, बह जाते गजराज।।
https://youtu.be/NyQab6Fi-2U
Writing by
Mr Surendra Mehra
Whatsapp no. 8003943337

Instagram
Mr Surendra Mehra Jnvu

Wednesday, May 6, 2020

#मत_मारो_हमें_भी_जीने_दो


किसी भी परिन्दें को न मारे उनका भी...
कोई इंतजार कर रहा होता है...

नई टीचर

लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर बेहद खूबसूरत और शैक्षणिक तौर पर भी मजबूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी...
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सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक करने लगी कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की...?
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मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की- एक महिला की पांच बेटियां थीं, पति ने उसको धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा, ईश्वर की मर्जी वो ही जाने कि छटी बार भी बेटी ही पैदा हुई और पति ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को ईश्वर के सुपुर्द कर दिया।
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दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक से गुजरा तो देखा कि कोई बच्ची को नहीं ले गया है, बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन रोज़​ यही होता रहा, हर बार पिता बाहर रख आता और जब कोई लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता, यहां तक कि उसका पिता थक गया और ईश्वर की मर्जी पर राज़ी हो गया।
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फिर ईश्वर ने कुछ ऐसा किया कि एक साल बाद मां फिर पेट से हो गई और इस बार उनको बेटा हुआ, लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक की मौत हो गई, यहां तक कि माँ पांच बार पेट से हुई और पांच बेटे हुए लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से चली जाती ।
सिर्फ एक ही बेटी ज़िंदा बची और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए।
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टीचर ने कहा- पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है ? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और कोई दूसरा नहीं जो उनकी सेवा करें। बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं ।
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पिता हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ करना।
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[एक बेटी के सन्देश को हर किसी तक पहूँचाना है इसलिए शेयर जरूर करें ]